सबरीमाला मंदिर मामला: धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन की ऐतिहासिक बहस
लेखक: प्रकर्ष पांडेय (Prakarsh Pandey)
प्रकर्ष पांडेय इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं। वे विधि क्षेत्र के साथ-साथ लेखक और शिक्षाविद् के रूप में भी जाने जाते हैं।
सबरीमाला मंदिर मामला
मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि केरल में स्थित विख्यात “सबरीमला मंदिर” से जुड़ी हुई है। यह मंदिर भगवान अयप्पा को अर्पित है, जो कि कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।
सन् 2018 तक 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाएँ इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती थीं। ऐसा माना जाता था कि मंदिर में मासिक धर्म वाली आयु की महिलाओं का प्रवेश भगवान अयप्पा की ब्रह्मचर्य परंपरा के खिलाफ है। यह प्रथा कई दशकों से चली आ रही थी और समाज ने इसे धार्मिक परंपरा के रूप में स्वीकार कर लिया था।
सन् 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने एस. महेंद्रन मामले में इस परंपरा को वैध घोषित कर दिया था और इसके बाद कानूनी रूप से भी महिलाओं के प्रवेश पर रोक जारी रही।
उसके बाद सन् 2006 में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की और इस परंपरा को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 25 के खिलाफ बताया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह परंपरा महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है। यही जनहित याचिका आगे जाकर सबरीमाला मंदिर केस के रूप में प्रसिद्ध हुई।
2018 के फैसले के बाद केरल में विरोध प्रदर्शन हुए। सुप्रीम कोर्ट में 2026 में पुनर्विचार याचिकाएँ दायर की गईं (भगवान अयप्पा के भक्तों ने, हिंदू धार्मिक संगठन और संस्थाओं ने, केंद्र सरकार ने भी समर्थन किया, अन्य द्वारा।)
मामले के तथ्य
- ४ अगस्त, २००६: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में सबरीमाला मंदिर में उम्र १० से ५० साल की महिलाओं के प्रवेश के लिए याचिका दर्ज की गयी।
- नवंबर २००७: केरल की तत्कालीन LDF सरकार द्वारा प्रतिबंध को चुनौती देते हुए एक हलफनामा दर्ज किया गया।
- अप्रैल 2016: सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई जारी रखी और लैंगिक न्याय तथा समानता को लेकर चिंताएँ व्यक्त कीं।
- ७ नवंबर २०१६: केरल सरकार ने कहा कि वह सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है।
- १३ अक्टूबर २०१७: सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को संविधान पीठ को भेज दिया।
- १७ जुलाई २०१८: पाँच-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई शुरू की।
- २८ सितंबर २०१८: सर्वोच्च न्यायालय ने ४:१ के बहुमत से प्रतिबंध को रद्द कर दिया और सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमला में प्रवेश की अनुमति दी।
- नवंबर २०१९: पुनर्विचार याचिकाओं को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया।
- १३ जनवरी २०२०: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता में नौ जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई शुरू की। पक्षों ने कहा कि रिव्यू याचिका सुनने वाली पीठ किसी कानूनी सवाल को बड़ी पीठ के पास नहीं भेज सकती।
- १० फरवरी २०२०: नौ जजों की पीठ ने 14 नवंबर के रेफरल आदेश को सही माना। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास रिव्यू याचिका में कानूनी सवाल को बड़ी पीठ को भेजने का अधिकार है। हालांकि, उस समय इसके कारण नहीं बताए गए। बाद में, 11 मई 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने एक विस्तृत फैसला जारी कर इस रेफरल को सही ठहराया।
- १६ फरवरी २०२६: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पांचोली की पीठ ने मामले को ७ अप्रैल २०२६ को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
- ७ से ९ अप्रैल, २०२६: पुनर्विचार याचिका के समर्थकों के तर्कों की पेशकश।
- १४ से १६ अप्रैल, २०२६: पुनर्विचार याचिका के विरोधियों के तर्कों की पेशकश।
मामले के मुद्दे
१. क्या उम्र १० से ५० साल की महिलाओं पर लगायी हुई बंदी केवल लैंगिक आधार पर है जो कि भेदभाव दर्शाती है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४, १५ और १७ का उल्लंघन करती है?
२. क्या ऐसी महिलाओं को बाहर करने की प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत एक “आवश्यक धार्मिक प्रथा” है और क्या कोई धार्मिक संस्था धर्म के मामलों में अपने स्वयं के मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार के तहत उस संबंध में दावा कर सकती है?
३. क्या सबरीमाला मंदिर एक अलग धार्मिक संप्रदाय है जो अनुच्छेद 26 के तहत सुरक्षा का हकदार है?
४. क्या केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश का प्राधिकरण) नियमों का नियम 3 ‘धार्मिक संप्रदाय’ को 10 से 50 वर्ष की आयु के बीच की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है? और यदि हां, तो क्या यह लिंग के आधार पर महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करके संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(3) का उल्लंघन नहीं करेगा?
महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में तर्क (याचिकाकर्ताओं की दलीलें) (2018)
- संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार समानता का अधिकार — महिलाओं को उनके मासिक धर्म के आधार पर रोकना संविधान में समानता अधिकार का उल्लंघन है। चाहे पुरुष हो या फिर महिलाएं, दोनों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।
- संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार केवल लिंग के आधार पर ही भेदभाव करके मंदिर में प्रवेश नहीं करने देना संविधान के खिलाफ है।
- संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता जैसी प्रथा/परंपरा — मासिक धर्म में महिलाओं को “अशुद्ध” मानकर उन्हें मंदिर से बाहर रखना अस्पृश्यता जैसी सोच को बढ़ावा देता है।
- संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार — महिलाओं को भी पुरुषों की तरह पूजा-पाठ, परंपराओं का पालन करने और मंदिर में प्रवेश करने का मौलिक अधिकार है।
- याचिकाकर्ताओं ने कहा कि महिलाओं का मंदिर में प्रवेश रोकना हिंदू धर्म की “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” नहीं है, इसलिए इस प्रथा या परंपरा को संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता।
महिलाओं के प्रवेश के विरोध में तर्क (प्रतिवादियों के तर्क) (2018)
- भगवान अयप्पा “नैष्ठिक ब्रह्मचारी” हैं इसलिए 10–50 वर्ष की आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता है क्योंकि यह धार्मिक परंपरा के खिलाफ है।
- प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि यह प्रथा लिंग भेदभाव नहीं है। क्योंकि मंदिर में प्रवेश पर सभी महिलाओं पर रोक नहीं है, केवल 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाएं ही मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं। इसलिए इसे पूर्ण महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव नहीं कहा जा सकता।
- महिलाओं के प्रवेश के विरोध में तर्क में यह भी कहा गया कि न्यायालय धर्म और परंपराओं के मामले में हस्तक्षेप न करें। सदियों पुरानी परंपरा को बदलना धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात होगा।
सबरीमाला मंदिर निर्णय (2018)
28 सितंबर 2018 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह मामला इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य के नाम से प्रसिद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ (दीपक मिश्रा, ए. एम. खानविलकर, आर. एफ. नरीमन, डी. वाई. चंद्रचूड़, इंदु मल्होत्रा) ने 4:1 के बहुमत से यह निर्णय दिया कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध असंवैधानिक है। अदालत ने कहा कि—
- संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना समानता के अधिकार का उल्लंघन है और यह अनुच्छेद 15 के अनुसार लिंग पर आधारित भेदभाव है।
- संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार महिलाओं को भी मंदिर में समान रूप से पूजा-पाठ करने का अधिकार है और यह प्रथा हिंदू धर्म की आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है।
परन्तु न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने बहुमत से अलग अपने विचार रखे और कहा कि अदालत को धार्मिक आस्था और परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अदालत को आस्था से जुड़े मामलों को श्रद्धालुओं पर छोड़ देना चाहिए और हर धार्मिक प्रथा को समानता के आधार पर नहीं जांचा जा सकता।
२०२६
महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में तर्क (याचिकाकर्ताओं की दलीलें) (2026)
- संविधान से ऊपर कुछ भी नहीं होता — मंदिर भी संविधान से ऊपर नहीं होता है। मंदिरों में भी संविधान लागू होता है और समानता भी होनी चाहिए। 10–50 आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोका नहीं जा सकता।
- हर पुरानी परंपरा या प्रथा वैध नहीं होती। कोर्ट हस्तक्षेप कर सकती है, अगर कोई प्रथा समानता को तोड़ती है। अदालत सामाजिक सुधार कर सकती है, समाज से किसी भी कुप्रथा को खत्म करने के लिए।
- मासिक धर्म कोई अशुद्धता नहीं है। इसके आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।
महिलाओं के प्रवेश के विरोध में तर्क (प्रतिवादियों के तर्क) (2026)
- धर्म आधुनिक सोच से नहीं चलता है। कोर्ट का काम संविधान लागू करना है, धर्म को बदलना नहीं। हर परंपरा को समानता के हिसाब से नहीं तोला जा सकता। जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त ही नहीं हैं, वे मंदिर की परंपरा को चुनौती नहीं दे सकते। कोई भी तीसरा व्यक्ति आस्था और भक्त के बीच नहीं आ सकता।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत संविधान में कहीं लिखा ही नहीं है। केवल धार्मिक समुदाय ही यह तय कर सकते हैं कि धर्म क्या है।
- धार्मिक संस्थान मंदिर में प्रवेश करने के लिए नियम बना सकते हैं, यह उनका अधिकार है। हर देवी-देवता की पूजा-पद्धति अलग होती है।
- केंद्र सरकार ने कहा कि वह 2018 फैसले के खिलाफ है। धर्म हमेशा वैज्ञानिक तर्क या समानता के आधार पर नहीं चलता है।
निष्कर्ष
सबरीमाला मंदिर का मामला धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच के संतुलन के लिए महत्ववपूर्ण है। इस मामले का निर्णय देश के ऐतिहासिक निर्णयों में से एक ज़रूर होगा।











